Saturday, June 17, 2017

बिना शर्तों का प्रेम

कहते हैं प्रेम की कोई भाषा नहीं होती और ना ही प्रेम उंच-नीच, जाति-धर्म , घर-परिवार, रंग-रूप देखता| प्रेम अन्धा होता है और यह अंधापन वाला प्यार उस खुली आँखों वाले प्रेम से कहीं बेहतर है जहाँ लोग प्रेम नहीं शतों पर प्यार करते हैं|
वेश्या शब्द अपने समाज में कलंक की तरह है परन्तु देखा जाये तो हर व्यापार करने वाला आदमी- औरत वेश्य और वेश्या ही तो हैं- मतलब की व्यापारी| चाहे फिर वो व्यापार किसी वस्तु, स्थान या देह का ही क्यों न हो| इस दिल और आँखों में पानी देने वाली इस कहानी को मैंने इन्टरनेट पर पढ़ा और उसे खोजा जिसने ये कृत्य सब तक पहुचाया| जीबीएम् आकाश नाम के किसी शख्स ने इस खुबसूरत इंसान को खोजा और उसकी इस प्रेम से भी परे, अथाह प्रेम की कहानी को हम तक पहुचाया|
यह कहानी भी एक वेश्या यानि व्यापारी की है,चाहे मज़बूरी में ही सही परन्तु वो अपनी बेटी को पालने के लिए अपने धंधे में साथ बहुत ही ईमानदारी से काम करती रही और एक दिन कुछ ऐसा हुआ जो इंसानियत जो वो करती थी उससे भी बड़ी मिसाल बन गया|



बांग्लादेश की रहने वाली रजिया पेशे से व्यापारी थी| एक सुबह की पहली बेला, घनघोर बारिश हो रही थी, रजिया पेड़ के नीचे खड़े हो कर सूरज निकलने का इंतज़ार कर रही थी| आँखों में आंसू, खुद के लिए गुस्सा और लाचारी से रजिया न जाने कितनी बार चिल्लाई और रोती रही | लगा इतनी सुबह कौन उसे सुनेगा और देखेगा| कम से कम बारिश के शोर में ही सही, अपने अन्दर के गर्द को निकल सकती है| रजिया जल्द ही अपनी बेटी के पास जाना चाहती थी| अब वो नहीं चाहती थी कि वो फिर किसी अजनवी को मिले और कुछ वक़्त उसके साथ गुजारे| उसकी बेटी, जो हर रात माँ से जाते वक़्त एक ही सवाल पूछती_ माँ आप रात में ही काम करने क्यों जाती हो| उसका जवाब रजिया के पास नहीं था परन्तु हर दिन जाते वक़्त उसकी बेटी उसे गले लगाती|

रोती रजिया को पता ही नहीं चला कि सामने दूसरी तरफ एक शख्स व्हीलचेयर पर बैठा उसे देख रहा है| उसको जब आभास हुआ जब दूसरी तरफ से जोर से खांसने की आवाज़ आई| वह शख्स उसका ध्यान पाना चाहता था|| रजिया ने बिना आंसू पोंछे बोला मेरे पास पैसे नहीं है जो मैं आपको दे सकूँ| उस शख्स ने मेरी हथेली पर ५० टाका रखे और बोला की बारिश तेज़ होने वाली है जल्दी ही घर चली जाओ और अपनी व्हीलचेयर को धक्का लगता हुआ वो शख्स मेरी आँखों से ओझल हो गया| मैं स्तब्ध थी, जैसे काटो तो खून नहीं| पहली बार मेरे पूरे जीवन में किसी ने बिना मेरा इस्तेमाल किये मुझे कुछ दिया | उस दिन मैं बहुत दिल खोल कर रोई|

उस दिन के बाद मैं उसी पेड़ के नीचे उस शख्स को तब तक खोजती रही जब तक मैंने उसे पा नहीं लिया| मुझे पता चला की उसकी पत्नी उसे छोड़ कर चली गयी क्योंकि वह अपाहिज है| बड़े साहस के बाद मैंने उसे बोला कि मैं शायद आपको दोबारा प्यार न दे पाऊं, परन्तु जीवनभर आपकी व्हीलचेयर को लेकर चलको को तैयार हूँ| वो मुस्कुराया और बोला- हर कोई प्यार के बिना व्हीलचेयर को धक्का नहीं दे सकता है|

आज हमारी शादी को चार साल हो चुके हैं| शादी वाले दिन उसने मुझे वचन दिया की अब तुम्हे मैं कभी रोने नहीं दूंगा| कभी-कभी एक वक़्त का खाना नहीं मिलता परन्तु हम हर दुःख- सुख में साथ है| आज हमें एक तस्तरी खाना मिला पर हमने उसे एक साथ मिलकर खाया|

उस अनजान व्यक्ति के वादे ने मुझे फिर कभी किसी अनजान पेड़ के नीचे खड़े होकर आजतक नहीं रोने दिया| अब्बास मिया ने अपने वादे को बखूबी निभाया|


रजिया बेगम

Tuesday, June 13, 2017

नन्ही कली





कली! दीदी ये नाम हमने बहुत सोच के रखा है अपनी बेटी का |है न खुबसूरत? इसका मतलब होता है फूल की बेटी और जो फूल निकलने से पहले उसका रूप होता है वो होती है कली| बड़ी ही मासूमियत के साथ कली के सारे मायने समझा दिए छोटे से गाँव में रहने वाली झवारी ने| बताती है मेरे पास २ बेटियां है वैसे तो सब प्यार दिखाते हैं पर दिल वाला प्यार नहीं, और तो और जब से हमें दो बेटियां हुई है मेरे लिए भी लगाव ख़तम सा हो गया है, न पति प्यार करता है और न ही सास| कहते हैं दो लालियाँ पैदा कर दी है| ये सब हमरे हाथ की बात तो नहीं ना दीदी| ये तो सब ऊपर वाले की कृपा है| न ठंग से खाने देते हैं और न ही पहनने को कपडे देते हैं, ऐसा लगता है मनो दीदी घर में सब चाहते हैं कि मेरी कली कैसे भी भगवान को प्यार हो जाये| कभी-कभी तो हमें भी घर से बाहर निकालने की बात करते हैं| वैसे तो हम घर से निकले हुए ही हैं, हमारा आदमी दूसरी लेके आ रहा है| इतना कह कर झवरी की आखों की किनखियों से पानी के दो मोती ज़मीन पे आ गिरे|

आपको पता है मैं क्यों अपनी बेटियों को घर नहीं छोडती? मैंने बोला नहीं, तुम ही बताओ| बोलती है घर के लोग पीछे से पानी अटका के मार देंगे मेरी नन्ही सी जान को| देखो न कितनी मासूमियत से हसती है| आँखों में मातृत्व का भाव लेकर कर अपनी बेटी को तीन मिनट कर निहारती रही और उसकी गतिविधियों को देख कर खुश होती रही|






तुम करती क्या हो झावारी और अगर तुम्हे घर से निकल दिया तो कैसे रहोगी, कभी सोचा है?
आँखों को थोडा छोटा करके दो मिनट सोचने के बाद बोली दीदी सोचा तो कभी नहीं पर इतना पता है अपनी बेटियों को यहाँ नहीं छोड़ेंगे, उनको पढ़ाएंगे-लिखाएंगे, अच्छा जीवन देंगे और शादी वो जब करना चाहेंगी तब कराएँगे| वैसे हम खेत का सारा काम कर लेते हैं तो कहीं मजदूरी करेंगे| सुना है शहर में बड़े लोग के घर काम वाली की ज़रूरत होती है हम वहां जाकर काम कर लेंगे|

तुम दूसरी शादी करने का नहीं सोचोगी? आँखें चड़ा कर बोली आदमी जात का क्या भरोसा दीदी, दुसरे ने भी छोड़ दिया तो एक और बेटी होने पर|





एक बात बोलें दीदी !! मैंने बोला! कहो तब से तुम ही तो हमें यहाँ बिठा कर रुला रही हो| थोडा हंसी और अपना एक हाथ मेरे पैर पर रख कर बोली आप एक औरत के दर्द को महसूस करती हो इसलिए रो रही हो, नहीं तो कौन किसे बैठ कर इतनी देर सुनता है, और आप को कितने दिन हुए हमेशा मिलने आती हो मेरी कली से| इसको आपकी आदत हो जाएगी|| मैंने बोला अब मुझे शर्मिंदा न करो बताओ क्या बोलने वाली थी| फिर थोडा हंसी और बोली ये दुनियां ऐसी है दीदी अगर लोगों के हाथ में लड़का-लड़की पैदा करना होता तो सिर्फ लड़के ही पैदा करते| कभी-कभी लगता है समाज में हम औरतों को इतनी कम इज्ज़त क्यों है| पर खैर कभी तो ये सब बदलेगा| इतना कह कर उठ खड़ी हुई और बोली बहुत बातें हुई दीदी अब काम पर लगते हैं| दूर खेत के बीच जाकर दुपट्टा बिछाया उसपर कली को बिठाया, फिर तल्लीनता के साथ काम में लग गयी| कभी- कभी बीच में नन्ही कली रोती तो उसे कुछ दिखा कर बहला देती और फिर काम में लग जाती|

Wednesday, May 17, 2017

बन्धनों को खोलता प्रेम

प्रेम की मिसाल आज से नहीं युगों-युगों से चली आ रही है| कृष्ण ने राधा, राम ने सीता, हीर ने राँझा, रोमियो ने जूलिएट, और न जाने कितने जिन्होंने प्रेम को परिभषित किया| जब भी इनकी कहानियों को हम सुनते हैं तो भाव-विभोर हो जाते हैं और  प्रेम की दाद देना शुरू करते हैं

हर ग्रन्थ, किताब या कहूँ व्यक्ति ने प्रेम को अलग-अलग तरीके से महसूस किया और इसे दुनिया की सबसे खुबसूरत भावना के रूप में बताया| कहते हैं सबरी ने राम को अपने झूठे फ़ल खिला दिए थे, और तो और मीरा ने कृष्णा के प्रेम में पड़ कर विष के प्याले को अमृत समझकर पी लिया था| ऐसे न जाने कितने उदाहरण है जिन्हें सिर्फ उन व्यक्ति विशेष ने जिया है औए अंत में जान देकर प्रेम को अमर किया है| अंत में त्याग ही हमेशा विजयी रहा है उसका कारण शायद यही है कि न तो आज और न ही युगों पहले लोगों ने इस खुबसूरत एहसास को स्वीकारा

रूमी ने प्रेम को जिस तरह परिभाषित किया, वह इंसान मात्र की कल्पना से परे रहा है| वस्तु से, मित्र से, कलम से, लिखने से, प्रेमिका से, आदि| अरे! ये कैसा प्रेम है जिसमे कोई शर्त नहीं, सिर्फ लगन ही लगन और वो भी ऐसी लगन जो सीधे प्रभु से मिलाने की बात करती हो| जिसमे प्रेम मिलने या एक होने की नहीं बल्कि सिर्फ समर्पण और प्रसन्नता भाव को प्राथमिकता देता हो

आज के दौर में देखा जाये तो समाज ही तय करता है कि प्रेम किससे करना है, क्यों करना है और कैसे करना है | ऐसे लगता है मनो जैसे लोग भूल गए हैं कि प्रेम जैसे खुबसूरत एहसास को बन्धनों में बांध कर पवित्र नहीं रखा जा सकता| ये एक बहाव है जितना बहेगा उतना ही अपना प्रभाव छोड़ेगा|

प्रेम ही एक मात्र सत्य है जो सबको जीना सिखाता है- आनंदमय जीवन|

Friday, September 23, 2016

भ्रूण हत्या से भी बड़ी एक हत्या

कुछ दिन पहले एक इंटरव्यू पढ़ रही थी किसी आईपीएस/आईएएस का- उस इंटरव्यू में साफ़ शब्दों में, बड़े गर्व के साथ बताया गया था- इस सफलता का श्रेय मैं मेरे पापा को देती हूँ, उन्होंने मुझे कभी लड़की की तरह नहीं पाला, हमेशा लड़के की तरह रखा और पढाया| यक़ीनन गर्व की बात थी, इतनी बड़ी पोस्ट जो मिली थी वो भी मेहनत और घरवालों के सपोर्ट से, परन्तु एक सवाल यहाँ आकर खड़ा हो जाता है ?
ये मेरी तीसरे नंबर की बेटी है, है तो ये मेरी बेटी बट इसने मेरा नाम बेटे की तरह रौशन किया है | जब ये पैदा हुई थी तो घर में मातम छा गया था, परन्तु जिस तरह इसने परिवार के नाम को एक बेटे की तरह ऊचा किया है अब मुझे इस पर नाज़ होता है|
अजी बेटी नहीं बेटा है, हीरा है, सबसे ज्यादा इस बेटे ने मुझे आत्म संतुष्टि दी है सबसे जिम्मेदार और समझदार| 
बात सिर्फ यहाँ ही ख़तम नहीं हो जाती आप देखिये किसी भी रियलिटी शो ( कही भी) में जब बेटियां कुछ कर दिखाती है तो अक्सर माँ- बाप से सुंनने को मिलता है कि इसने मेरा इतना नाम रौशन किया है ये "मेरी बेटी नहीं ये मेरा बेटा है"| जब उम्मीदें  बहुत आगे होती हैं तो लोगों को और  भी यही चिल्लाते सुना है कि आगे जाकर ये मेरा नाम एक बेटे की तरह रौशन करेगी| ऐसे तमाम रियलटी शो, सेरिअल्स,इंटरव्यूज, कहानी, किस्से, कवितायेँ फिल्में और न जाने क्या- क्या जहाँ अक्सर लोग अपने बच्चियों की सफलता को यही कह कर प्रोत्साहित करते हैं | 
ऐसा लगता है मानो लोग पहले से ही मान के बैठे हैं कि बेटियों को बेटी समझ कर पढाया ही नहीं जा सकता| अगर बेटियों को घर से बाहर  भेजना है तो उसे बेटा मानना ही पड़ेगा| बेटियां -बेटी होकर कभी नाम रौशन कर ही नहीं सकती, और  अगर कर भी देती हैं तो न जाने क्यों उनको बेटों का दर्ज़ा दे दिया जाता है| मज़े की बात तो ये भी है कि हममें से ज्यादातर बेटियां ये सुनकर खुश हो जाती हैं कि हमें बेटों का दर्ज़ा दिया जा रहा है|

जब घर से बाहर पढने गयी तो घर में मैंने भी अक्सर सबको यही कहते सुना- वर्षा ( मेरा घर का नाम)तो बेटा है, बेटी होते हुए भी बेटों से आगे है| एकदिन खीज कर माँ को बोल दिया, ऐसा न कहा करो, पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लगता, करना है तो ऐसे ही  प्रोत्साहित कर दो|  उस वक़्त समझ नहीं आया था कि इतना बुरा क्यों लगता है,और शायद परिवार वालों को भी समझ नहीं आया होगा परन्तु कहना छोड़ दिया|
अरे मैं तो कहती हूँ भला हो उन लोगो का जो बेटी को पैदा होते ही मार देते हैं या पैदा होने से पहले ही मार देते हैं (कटाक्ष) क्योंकि इस हत्या से बड़ी हत्या और क्या हो सकती है कि बड़ा होने के बाद बेटी जब  नाम रौशन कर दे तो उसको बेटी ही न रहना दिया जाये|

बात यहाँ बेटा या बेटी की नहीं साहेब, और न ही मैं लड़कों के विपक्ष में हूँ| मुझे लगता है सबसे बड़ा अपमान/हत्या किसी की पहचान छिनना है|( फिर चाहे उस जगह कोई भी हो)
और यह पहचान आज से नहीं सदियों से छिनती आई है, जिसका एहसास भी नहीं होने दिया गया|

अब देखना तो ये है कि आने वाली फिल्म 'दंगल' में किस तरह से बेटियों को दिखाया गया है, बेटी ही रखा है या कुछ अलग करने पर उन्हें भी बेटों का दर्ज़ा देकर समान्नित (कहूँ या अपमानित ) किया जायेगा| 


....अब और नहीं...

Tuesday, July 7, 2015

एक पत्र प्रकृति के नाम

विकास पर विकास, विकास पर विकास, भईया कितना विकास? और किस-किस के लिए विकास?
सुनकर बड़ी ख़ुशी होती है कि भारत आधुनिकीकरण और विकास के मामले में बड़ी तेज़ गति से भाग रहा है, कभी डिजिटल इंडिया की बात सुनने को मिलती है तो कभी अलग-अलग राज्यों में दौड़ती मेट्रो की|
परन्तु महोदय हमारी चिंता का विषय बने हुए हैं बड़ी तेज़ गति से कटते पेड़- पौधे और बेघर होते पशु-पक्षी | इन्हें हमारे विकास में कोई रूचि नहीं | पशुओं को आज भी ज़मीन पर उसी तरह सोने की आदत है, जैसे वो आज से हज़ारों साल पहले सोते थे, और पक्षियों को आज भी पेड़ों पर घोंसले बनाने में उतने ही आनंद की अनुभूति होती है, जितने आज से हज़ारों साल पहले होती थी | परन्तु अब ना घर बनाने को पेड़ उतने बचे हैं और ना सोने को ज़मीन, सब पर मालिकाना हक़ है, तो वो सिर्फ इंसानों का | पक्षियों ने तो घरों में घर बना कर समझौता भी करने की कोशिश की, परन्तु हमारी जाति को चैन कहाँ - ये पक्षी बड़ी गंदगी करते हैं, बोल के, घोंसले बाहर निकाल फेंके |
और तो और मैंने तो एक महोदय को ये भी कहते सुना कि सरकार को प्लानिंग करना ही नहीं आता, किसी अच्छे सिविल अभियंता को बुलाते जो इस मेट्रो स्टेशन (जिन मेट्रो प्लेटफार्म की छतें खुली हैं) को सही से डिजाईन करता, देखो कितनी गंद मचा रखी है इन कबूतरों ने, टाप देते तो सफाई तो रहती | अब महोदय उनको इंग्लिश टॉयलेट प्रयोग करना कौन सिखाये? वैसे दौर आधुनिकीकरण का है, बदलना तो इनको भी चाहिए, पर क्या करें इनको हमारे आधुनिकिकरण और विकास से ना कुछ लेना-देना और ना ही कुछ फायदा | कुछ समय पहले मैंने एक स्टेटस देखा... महाशय ने फेसबुक पर बड़ी तक़लीफ और गुस्से के साथ लिखा था - ब्लडी अर्थक्वेक- कितनों के घर उजाड़ दिए, ऊपर वाला भी कितना नाइंसाफी करता है, लोगो की तकलीफ नहीं दिखती उसे (गुस्से वाले ३ चेहरे) |
अब ज़रा इन महोदय को कोई समझाए कि जिस तरफ उंगली उठा रहे हो उसमें तीन उंगली अपनी ही तरफ हैं, अरे पागल हाथी जब चलता है ना, तो वो ये नहीं देखता कि मैं कितनों को कुचलता हुआ जा रहा हूँ..क्योकि उसे अपनी धुन के आगे कुछ दिखाई नहीं देता, अब यही हाल हो गया है हमारी जाति का(मानव जाति), सब मतवाले हाथी हो चले हैं, बस अपनी धुन में अपने घर बसाये जा रहे हैं, कितनों के उजड़े हैं ये मालूम भी नहीं होगा | जनाब! घर... घर होता है, वो चाहे गरीब का हो, अमीर का या फिर पक्षियों का | साहब बड़ी तकलीफ होती है जब घर उजड़ते हैं | कितने मंजर देख चुकी है हमारी जाति घर उजड़ने के, फिर भी इसका मूल्य अभी तक समझ नहीं आया | कभी किसी उजड़े घर वाले की आँखों में आँखे डाल के देखा है? कितना दुःख और निराशा होती है |

अब इंसान का दर्द तो हम समझ ही सकते हैं क्योंकि कहने को तो हम भी इंसान ही है, पर भईया पक्षियों की आँखों में कैसे देखे ..?? अब कहीं बैठ के अच्छे से आँख दिखाए तो कुछ समझने की कोशिश भी की जाये | दुःख और दर्द तो तब ही समझ आता है न जब कोई चिल्ला-चिल्ला कर बताये या फिर रो-धोके सुनाये | पर कहते हैं, न ऊपर वाले के घर देर है, अंधेर नहीं | इंग्लिश में एक कहावत भी तो है- EVERYTHING IN NATURE IS ABOUT BALANCE. तो ये भी समझ लीजिये संतुलन का ही हिस्सा है |

और फिर एक बात हमारी भी सुनो- भूकंप से कोई नहीं मरता, अगर लोग मरते हैं तो अपनी खुद की बनायीं ठोस सीमेंट की बिल्डिंग्स के नीचे दब के| पृथ्वी के नीचे की हलचल कोई नई बात नहीं, इसका इतिहास उतना ही पुराना है जितना इसकी रचना का |
दो बातें हमें समझना बहुत ज़रूरी हो गया है, पहली ये कि पृथ्वी सिर्फ मानव जाति के लिए नहीं बनी है इसपर सबका बराबर हक़ है | और दूसरी ये कि हम सर्वोत्तम नहीं हैं, प्रकृति के एक छोटे से हिस्से हैं, एक सीमा तक बदलाव ठीक है, परन्तु खिलवाड़ ठीक नहीं |

Thursday, March 19, 2015

अभी रावण नहीं मरा है|

सुना था किसी युग में
राम ने मारा था रावण,
जानते हो क्यों मारा था?
सीता का किया था हरण,
लेकिन आज इस युग हर कोई सीता हरता है, 
फिर भी, इस निकृष्ट समाज में सम्मान लिए फिरता है|
असलियत तो यही है समाज रावणों से भरा है,
राम तुणीर रिक्त हुआ 
अभी रावण नहीं मरा है|

Wednesday, July 2, 2014

प्यार v/s प्यार

एक बार चाय पीते वक़्त चाय के ठेले पर लोगों से जान- पहचान सी हो गयी, ठेला बोलो या चाय की दुकनिया, वो नार्थ कैम्पस वालों के लिए वार्तालाप का अड्डा थी|  शहर था दिल्ली, तो लोगों का थोडा एडवांस होना स्वाभाविक था| उस अड्डे पर बड़े-बड़े विद्वान आकर छोटे से छोटे और बड़े से बड़े मुद्दों पर विचार विमर्श करते और चाय की चुक्सकियों के साथ हर मुद्दे को घोल कर पी जाते| कुछ लोग हाथ फैला फैला कर बाते बनाते और सभी को यकीं दिलाने की उम्मीद से हर तरफ अपना सिर हिलाकर सहमती जताने के लिए उकसाते| परन्तु उनमें से कुछ महानुभाव ऐसे भी थे जो सारे वृतांत को सुनते और अंत में अपना निर्णय सुना कर चलते बनते| अगर गिनती की जाये उनमे सिर हिलाने वालों की तादात ज्यादा थी|

एक दोपहर चाय पीने की लालसा लिए हम भी उस दुकनिया पर पहुचे, वो विद्वान, जिनकी चर्चा हमने पहले की थी, उनका ज्यादातर समय चाय की दुकान पर वार्तालाप में ही निकलता| उस वक़्त भी एक बड़ी तादात में लोग वहीँ थे| हमने अपनी बत्तीसी दिखा कर सबका अभिवादन स्वीकार किया और आँखों में सम्मान भाव लिए उन्हें भी स्वीकारने को कहा| और एक कोने में पड़ी टूटी बेंच पर जा बैठे| अभी चाय  का आर्डर किया ही था कि अचानक पीछे से एक भनभनाती आवाज आई “सेक्स इज द पार्ट ऑफ़ लव” और फिर क्या था देखते ही देखते माहौल गरमा गया, लोग अपने अपने विचार रखने लगे| वाद- विवाद प्रतियोगिता शुरू हो गयी, कुछ पक्ष में तो कुछ विपक्ष में| बड़ी- बड़ी बाते हुई, कुछ ने अपना खुद का अनुभव सामने रखा तो कुछ सिर्फ किताबी ज्ञान के आधार पर अपने निर्णय सुनाने लगे, कई तो खुद को सही सिद्ध करने के लिए उत्तेजित हो गए, परन्तु उनकी उत्तेजना को दबा दिया गया|  कुछ लोग विपक्ष से पक्ष में आ गए और कुछ कूद कर पक्ष से विपक्ष में चले गए और सिर हिलाने वालों ने अपना सिर रफ़्तार से हिलाना शुरू कर दिया, कभी एक बार इधर हिला कर अपनी सहमती जताते तो दूसरी बार उस तरफ सिर हिलाते| अंततः निर्णय आया कि हाँ- प्यार यौन संबंधो का हिस्सा नहीं बल्कि यौन सम्बन्ध प्यार का हिस्सा हैं”|
मैं आपको बता दूँ कि कुछ समय पहले मैं एक ऐसे गाँव में थी| जहाँ फ़ोन का नेटवर्क भी पहाड़ों पर चढने के बाद मिलता, दूर दूर तक सिर्फ औरतें और पशु ही नजर आते, औरतें सुबह से शाम तक काम में व्यस्त और पशु घास चरने में| नहीं! मैं ऐसा कदापि नहीं कह रही हूँ जैसा आप सोच रहे हैं, वहां पुरुष जाति भी थी परन्तु उनको सिर्फ शाम ७ बजे से सुबह ७ बजे तक ही देखा जा सकता था| कुछ घरों में पुरुषों के काम की अगर में बात करूँ तो देसी दारू के नशे में औरतों पर आर्डर झाड़ना और उनकी पूर्ति होना यही उनकी मनसा रहती थी। आदेश पूर्ति न होने पर हिंसा का सहारा लेकर घर के माहौल को बिगड़ना उनका दूसरा काम था|
घर की छोटी बहू उर्फ़ मेरी मुहबोली भाभी जो की छोटी सी उम्र में ही एक बच्चे की माँ बन चुकी थी ,से मैंने पूछा कि भाभी प्यार क्या होता है? उन्होंने तपाक से उत्तर दिया दीदी जो टीवी में होता है, हीरो और हेरोइनी जो करते हैं| जवाब बिलकुल सही था, क्योंकि हमारे यहाँ वही तो प्यार होता है| दूसरा सवाल था कि क्या आपने कभी प्यार किया है ? उन्होंने जवाब थोडा मुह बनाकर दिया, दीदी हम इन बातों से बहुत दूर रहे हैं, हमने कभी किसी से प्यार नहीं किया| ये भी सही बात है, यही तो सिखाता है हमारा समाज| किताबों और फिल्मों के हिस्से में आ चुका है प्यार| तीसरे सवाल का जवाब सुन कर मुझे दुःख हुआ, सवाल था कि तो भाभी जी ये जो आपका बेटा है वो किसका फ़ल है? थोडा शर्म से लाल होती हुई उसने मुझे देखा, कुछ देर चुप रहने के बाद बोली, दीदी आप भी अजीब से सवाल पूछ रही हो इसमें प्यार वाली कौन सी बात है शादी के बाद तो ये सब होता ही है, अगर नहीं होगा तो किस औरत को सम्मान मिलेगा| हालाँकि जवाब थोडा सा अलग था जो सवाल मैंने पूछा था परन्तु उन्होंने जो जवाब दिया वो मेरे लिए खुद एक सवाल बन गया और उसके बाद मैंने उनसे कुछ भी नहीं पूछा वो अपने काम में लग गयी| मैं उन्हें बहुत देर तक देखती रही और सिर्फ यही बात मेरे मन में चल रही थी कि गमछे की सच्चाई उन विद्वानों के अल्फाजों से कितनी अलग है ना, जहाँ प्यार शब्द सुन कर ही लोगों में सिहरन हो उठती है वहीँ ये शब्द इनके लिए कोई धब्बा है|