Saturday, July 22, 2017

जाको राखे साईंयां मार सके न कोई|



जाको राखे साईंयां मार सके न कोई! यह कहावत सिर्फ कहने के लिए ही नहीं बनायीं| यक़ीनन लोगों के अनुभव और चमत्कारिक घटनायों ने इसे अंजाम दिया होगा तब ही लोग एक विश्वास पर पहुच पाते हैं| ऐसी ही एक कहानी आज आपको बताने जा रहे हैं जो कि एक १७ साल की बच्ची की है जो एक हवाई जहाज के क्रैश होने के बाद वो जिंदा रह गयी|

BBC के अनुसार, जर्मन-पेरुवियन जुलिआन कोएप्क सन १९७१ में अपनी माँ के साथ हवाई जहाज में यात्रा कर रही थी| जहाज अपनी गति से अमेज़न के ऊपर से निकल रहा था, तभी कुछ ऐसा हुआ की सभी बैठे यात्रियों के होश उड़ गए क्योंकि जहाज को किसी चीज़ ने जबरदस्त हिट किया| वह और कुछ नहीं आकाशीय बिजली जहाज पर आ कर गिरी थी, जिस वजह से जहाज में खराबी आ गयी और सभी यात्रियों के साथ जहाज ज़मीन पर आ गिरा|

यह हादसा जुलिआन के हाई स्कूल के एक रात बाद का है जब उनकी माँ उन्हें ले कर वापस क्रिसमस मनाने के लिए जर्मनी आ गयी थी|  जुलिआन की हाई स्कूल ख़तम होने पर फंक्शन में शामिल होने उनकी माँ गयी थी और उसके बाद उन दोनों को जर्मनी आना था जहाँ उनके पिता रहते थे|

जुलिआन २ मील की दूरी से पृथ्वी पर आ गिरी| चमत्कारिक ढंग से, वह इस कहानी को बताने वही एक उस पूरे जहाज में थी जो बच गयी, परन्तु दुर्भाग्यवश उनकी माँ और सभी यात्री इस हादसे से नहीं बाच पाए|

आश्चर्य करने वाली बात यह थी कि जहाँ उनका जहाज क्रैश हुआ था वह स्थान अत्यंत भयावक और असम्भव परिवेश था, जहाँ बिना किसी हथियार या सुविधा के १० दिन तक जीवित रहना असम्भव था| भयानक जंगल, जहरीले पेड़-पौधे. भूखे जंगली जानवर, आदि|

कोई भी साधारण व्यक्ति का ऐसे परिवेश में जिंदा रहना संभव ही नहीं था, परन्तु जुलिआन कोई आम किशोरी नहीं थी| उसने घायल होने के बावज़ूद १० दिन तक ना ही सिर्फ जिंदा रही बल्कि उस जंगले को पार करके वह लोगों तक पहुची और मौत को मात दे दी|


जुलिआन का जन्म पेरू में हुआ था| उसके पिता जर्मन होने के साथ-साथ जीव विज्ञानी थे और पेरुवियन माँ पक्षी विज्ञानी थी| इसी वजह से उसने अपनी बहुत सारा वक़्त उनके अपने माँ-बाप के साथ अमेज़न के जंगलों में गुजरा था जहाँ वह अपने शोध को अंजाम देते थे|

अनजाने में ही सही परन्तु उसने अपने माँ-बाप के साथ इस गुजारे वक़्त में बहुत कुछ सीख लिया जो उसे इस जहाज क्रैश के समय काम आया| उसके सीखा कि कैसे विपरीत परिस्थियों से कैसे लड़ा जाये और उसमे खुद को जीवित रखा जा सकता है| उसको कभी नहीं पता था कि अनजाने में सीखे हुए ये कौशल उसे ऐसे काम आयेंगे जिससे वो खुद को बचा पायेगी|
जूलियन की माँ और पिता

जुलिआन ने BBC को बताया, जहाज बादलों के ऊपर से गुजर रहा था, जहाँ भयानक तूफान के साथ-साथ आकाशीय बिजली भी थी| इस घटना की गंभीरता का पता तब चला जब आकाशीय बिजली जहाज से आ टकराई| उसके बताया कि १० मिनट बाद बायें तरफ के इंजन से आग निकलने लगी| तब मेरी माँ ने बहुत ही शांत शब्दों में बोला- 'यही अंत है, सब ख़तम हो गया'| यही उनके अंतिम शब्द थे|

अगले ही पल उसने देख जहाज नीचे की तरफ जा रहा था वह अपनी माँ से अलग हो गयी, हर तरफ चिल्लाहटें थी| थोड़ी देर बाद आवाजें शांत हो गयी, उसने देखा वह जहाज से बाहर थी, और नीचे की तरफ रफ़्तार से गिरती जा रही थी| मैं सीट के साथ पेटी से बंधी हुई थी| उस वक़्त मैं सिर्फ हवा की फुसफुसाहट सुनाई दे रही थी|

ज़मीन पर आते ही उसने अपने होश खो दिए और अगले दिन तक वह बेहोश पड़ी रही| जब उसे होश आया तो उसकी गले की हड्डी टूटी हुई थी, कुछ गहरी चोटें उसके शरीर पर थी, परन्तु उसको सब याद था कि कल पिछले दिन क्या हुआ था|

उसने उस भयावक जंगले में १० दिन गुजारे| उसने अपने एक जूते (जो उस जहाज क्रैश में बच गया था) की सहायता सेमैदान का परिक्षण करते हुए जंगले को पार किया| वह जानती थी कि वह एक असत्कारशील परिवेश में है| जहाँ वो चरों तरफ बहयांक जानवरों और जहरीले पेड़-पौधों से घिरी हुई है|

उसे एक टाफियों से भरा बैग मिला जो उस प्लेन क्रैश में किसी का रहा होगा| उसने उन टाफियों की सहायता से उसने थोड़े पोषक तत्वों को बचा कर रखा| खुख लगने पर उन्हें खाया क्योकि वह जंगल से कुछ नहीं खा सकती थी|

चोथे दिन उसने जानलेवा अनुभव किया , जब उसने अपने चरों तरफ सिर्फ लाशें ही लाशें देखी यह लाशें उन्ही लोगों की थी जो इस  जहाज क्रैश में मरे थे| उसने बताया की इतनी साडी लाशों को देख कर वह पेनिक हो गयी क्योकि उसने अपने जीवन में पहले बार मरे हुए इंसान को देखा वो भी एक साथ इतने सारे|

उसके अगले कुछ दिन भी यूँ ही भयावक अनुभव से भरे हुए थे| एक तो अकेले भयानक जंगले में, शरीर पर छोटे और खाने के लिए भी कुछ खास नहीं और सबसे खतरनाक दिशाहीन रास्ते|

आखिरकार दसवे दिन वह कुछ लोगों की आवाज़ सुनकर जागी, जो कि लड़की काटने वाले लोग थे| जब उन लोगों ने उसे पहली नजर देखा तो सब के सब डर गए क्योंकि उनको लगा वह कोई भूत है| परन्तु भाग्यवश जुलिआन को स्पेनिश बोलना आता था तो उसने सारी स्थिति उन लोगो को समझा दी और उन लोगों ने उसे खाने को दिया और उसके घावों पर मरहम पट्टी भी की|

अगले दिन वह उसे उसके गन्तव तक ले गए जहा उसके पिता को उसको सोंप दिया गया, जिससे वह उसकी देखरेख कर सकें| जुलिआन की सहायता से उसकी माँ मारिया की लाश को भी खोज लिया गया परन्तु दुर्भाग्यवश उसकी माँ को ज्यादा गहरी चोटें रही होंगी इसलिए वह बच न सकीं|

जुलिआन ने अपनी माँ की विरासत को संभाल कर रखा और आज वह जीव विज्ञानी हैं|  पढाई पूरी करने के बाद वह अपने देश जर्मनी वापस आ गयी| इस दुर्घटना के अनुभव को वो कभी नहीं भूल सकती| उनका बचना उनके लिए ही नहीं पूरे विश्व के लिए चमत्कार था|

तब ही तो किसी ने ठीक ही कहा है- जाको राखे साईंयां मार सके न कोई|

Friday, July 21, 2017

आंगन का दिया


उस दिन सारे गाँव में बिजली नहीं थी क्योकिं सुबह से बारिश बहुत तेज़ थी, शायद कोई तार हिल गया होगा या ट्रांसफार्मर में आग लग गयी होगी| हर शाम की तरह दादी ५ बजे ही खाना बनाने बैठ गयी और दादू उनको हर रोज़ की तरह सामान उठा-उठा कर मदद करने लगे| खाना बना और खा-पी कर हम सब ६ बजे तक बिस्तर में आ गए| मैं दूसरे कमरे मैं थोडा लैपटॉप पर अपना काम निपटने चली गयी| दादू ने रेडिओ ओन कर किशोर के पुराने गाने लगा दिए और दोनों अपनी-अपनी खाट पर लेटे-लेटे गुनगुनाने लगे|

थोड़ी देर काम करने के बाद सोचा क्यों न इतने बड़े घर में फैले सन्नाटे की कहानी दादू से सुनी जायें, सोच कर  मैं भी उनकी साइड में पड़ी खाट पर आ कर लेट गयी और बारिश की गिरती बूदों को सुनने का प्रयास करने लगी| कोठरी में तमाम पुराना सामान था या कहूँ दादी को जो सामान उनके मायके से शादी के वक़्त मिला था वही- लोहे का नक्कासियों से जड़ा हुआ संदूक, पुराना रेडियो, एक टूटी सी साइकिल, जिसकी चैन नीचे तक झूल रही थी, जिससे पता चल रहा था कि वह आने काम में सफल रही है| एक बहुत ऊँचे पाए वाली खाट, जिस पर मुझे सुलाया गया था और पीतल के कुछ बर्तन|
२ दिन हो गए थे आये मुझे, इतना बड़ा घर, जिसमें सभी सुख-सुविधाएं, बड़े-बड़े ऊपर से नीचे तक कमरे बने हुए थे, उनमें डबल बेड, सोफे कुर्सी भी थे, परन्तु फिर भी न जाने क्यों  दादा- दादी इस पुरानी कोठरी में ही अपना ज्यादातर वक़्त गुजारते हैं|

थोड़ी देर मौन रहने के बाद मैंने गानों की श्रंखला में खलल डाली और पूछा सब कहाँ-कहाँ सेटल हो गए दादू..? कुछ पल थमे और फिर दोनों ने बोलना शुरू किया और बोलते गए, कभी बोलते-बोलते दोनों हसे तो कभी आँखें भर भी आयीं| यादों का सिलसिला करीबन २ घंटे बिना किसी अन्तराल के चलता रहा और अंत में बिना किसी पड़ाव पर पहुचे समझोते पर आ कर रुक गया|

मैंने दादू का परिचय नहीं कराया| मेरे ही दादू नहीं बल्कि सारा स्कूल उनको प्यार से दादू बोलता था क्योंकि वह सबसे ज्यादा अनुभवी थे पूरे स्कूल में| रिटायर्मेंट के बाद इलाहाबाद के पास अपने छोटे से बड़े गाँव मैं वापस आ गए और अपने माँ बाप की सेवा में लग गए| कुछ दिन बाद पिताजी ने समाधी ले ली परन्तु माँ आज भी जिंदा हैं और उनका ख्याल दादू बड़े प्यार से रखते हैं|

बनारस से गुजरते वक़्त मैंने सोचा क्यों ना गुरुपूर्णिमा वाले दिन दादू को सरप्राइज दिया जाये, परन्तु बिना उनकी मदद के उस गाँव में पहुचना थोडा मुश्किल था| दादू ३ घंटे पहले ही बस स्टैंड आ कर बैठ गए और आस-पास के सारे लोगों को बता दिया कि मेरी बेटी आ रही है| गाँव की खूबसूरती होती है कि मेहमान एक के घर में आये तो वो सबका मेहमान होता है| जब मैं पहुची तो बस स्टैंड पर बहुत से लोग मेरा इंतज़ार कर रहे थे| सबको अभिवादन कर उनसब के साथ दादू के घर आ गयी और हसी-मजाक, ठहाके- यादों का सिलसिला तक़रीबन सारे दिन चला| दादू ने अपनी लिखी बहुत सारी  नयी कवितायेँ सुनाई, वह बेहद खुश थे, हम मंडी गए, सब्जी खरीद, बहुत तरह के आम ख़रीदे, कई लोगों से मिले|

२ दिन बाद मुझे जयपुर के लिए निकलना था| मैं सामान पैक कर रही थी और दादू साइड में बैठ कर मुझे बार-बार धन्यवाद दे रहे थे और अगली बार आने की तिथि पूछ रहे थे| दादी ने बहुत तरह के बहुत सारे आम पैक कर दिए| मैंने गाँव के बहुत लोगों से विदाई ली और दादी को गले लगाया ही थी कि  उनकी आँखों से आंसू बह निकले और दादू ने एक रुखी मुस्कराहट के साथ कहा तुम घर को फिर से सुना कर चली| मैंने उनकी दोनों की आँखों में दर्द की एक पोटली को फिर से खुलते देखा, उस हरिया घर को सूखते झाड बनने की कसक को मैं साफ़ महसूस कर पा रही थी| सजी हुई दीवारें जो अब धूमिल होती जा रही थीं और छत से गिरती बेलें अचानक से बोलने लगी| मैंने बैग उठाया और चलती चली गयी और न जाने कहाँ तक मैं अपने आँखों में आये सैलाव को रोक नहीं पाई|

कहानी अभी बाकि है......

Saturday, June 17, 2017

बिना शर्तों का प्रेम

कहते हैं प्रेम की कोई भाषा नहीं होती और ना ही प्रेम उंच-नीच, जाति-धर्म , घर-परिवार, रंग-रूप देखता| प्रेम अन्धा होता है और यह अंधापन वाला प्यार उस खुली आँखों वाले प्रेम से कहीं बेहतर है जहाँ लोग प्रेम लगन से  नहीं शर्तों पर करते हैं|
वेश्या शब्द अपने समाज में कलंक की तरह है परन्तु देखा जाये तो हर व्यापार करने वाला आदमी- औरत वेश्य और वेश्या ही तो हैं- मतलब कि व्यापारी| चाहे फिर वो व्यापार किसी वस्तु, स्थान या देह का ही क्यों न हो| दिल और आँखों में पानी देने वाली इस कहानी को मैंने इन्टरनेट पर पढ़ा और उसे खोजा जिसने ये कृत्य हम सब तक पहुचाया| जीबीएम् आकाश नाम के किसी शख्स ने इन दोनों खूबसूरत प्राणियों को खोजा  और उसकी इस प्रेम से भी परे, अथाह प्रेम की कहानी को हम तक पहुचाया|
यह कहानी भी एक वेश्या यानि व्यापारी की है,चाहे मज़बूरी में ही सही परन्तु वो अपनी बेटी को पालने के लिए अपने धंधे में साथ बहुत ही ईमानदारी से काम करती रही और एक दिन कुछ ऐसा हुआ जो इंसानियत वो करती थी उससे भी बड़ी मिसाल बन गया|



बांग्लादेश की रहने वाली रजिया पेशे से व्यापारी थी| एक दिन सुबह की पहली बेला, घनघोर बारिश हो रही थी, रजिया पेड़ के नीचे खड़े हो कर सूरज निकलने का इंतज़ार कर रही थी| आँखों में आंसू, खुद के लिए गुस्सा और लाचारी से रजिया न जाने कितनी बार चिल्लाई और रोती रही | लगा इतनी सुबह कौन उसे सुनेगा और देखेगा| कम से कम बारिश के शोर में ही सही, अपने अन्दर के गर्द को निकल सकती है| रजिया जल्द ही अपनी बेटी के पास जाना चाहती थी| अब वो नहीं चाहती थी कि वो फिर किसी अजनवी को मिले और कुछ वक़्त उसके साथ गुजारे| उसकी बेटी, जो हर रात माँ से जाते वक़्त एक ही सवाल पूछती_ माँ आप रात में ही काम करने क्यों जाती हो| उसका जवाब रजिया के पास नहीं था परन्तु हर दिन जाते वक़्त उसकी बेटी उसे गले लगाती|

रोती रजिया को पता ही नहीं चला कि सामने दूसरी तरफ एक शख्स व्हीलचेयर पर बैठा उसे देख रहा है| उसको जब आभास हुआ जब दूसरी तरफ से जोर से खांसने की आवाज़ आई| वह शख्स उसका ध्यान पाना चाहता था|| रजिया ने बिना आंसू पोंछे बोला मेरे पास पैसे नहीं है जो मैं आपको दे सकूँ| उस शख्स ने मेरी हथेली पर ५० टाका रखे और बोला की बारिश तेज़ होने वाली है जल्दी ही घर चली जाओ और अपनी व्हीलचेयर को धक्का लगता हुआ वो शख्स मेरी आँखों से ओझल हो गया| मैं स्तब्ध थी, जैसे काटो तो खून नहीं| पहली बार मेरे पूरे जीवन में किसी ने बिना मेरा इस्तेमाल किये मुझे कुछ दिया | उस दिन मैं बहुत दिल खोल कर रोई|

उस दिन के बाद मैं उसी पेड़ के नीचे उस शख्स को तब तक खोजती रही जब तक मैंने उसे पा नहीं लिया| मुझे पता चला की उसकी पत्नी उसे छोड़ कर चली गयी क्योंकि वह अपाहिज है| बड़े साहस के बाद मैंने उसे बोला कि मैं शायद आपको दोबारा प्यार न दे पाऊं, परन्तु जीवनभर आपकी व्हीलचेयर को लेकर चलको को तैयार हूँ| वो मुस्कुराया और बोला- हर कोई प्यार के बिना व्हीलचेयर को धक्का नहीं दे सकता है|

आज हमारी शादी को चार साल हो चुके हैं| शादी वाले दिन उसने मुझे वचन दिया कि अब तुम्हे मैं कभी रोने नहीं दूंगा| कभी-कभी हमें सिर्फ एक वक़्त का खाना हीं मिलता है परन्तु हम हर दुःख- सुख में एक दुसरे के साथ है| जैसे आज हमें एक तस्तरी खाना मिला पर हमने उसे एक साथ मिलकर खाया|

उस अनजान व्यक्ति के वादे ने मुझे फिर कभी किसी अनजान पेड़ के नीचे खड़े होकर आजतक नहीं रोने दिया|

अब्बास मिया ने अपने वादे को बखूबी निभाया|


रजिया बेगम

Tuesday, June 13, 2017

नन्ही कली





कली! दीदी ये नाम हमने बहुत सोच के रखा है अपनी बेटी का| है न खूबसूरत? इसका मतलब होता है फूल की बेटी और जो फूल निकलने से पहले उसका रूप होता है वो होती है कली| बड़ी ही मासूमियत के साथ कली के सारे मायने समझा दिए, छोटे से गाँव में रहने वाली झवरी ने| बताती है मेरे पास २ बेटियां है वैसे तो सब प्यार दिखाते हैं पर दिल वाला प्यार नहीं, और तो और जब से हमें दो बेटियां हुई है मेरे लिए भी लगाव ख़तम सा हो गया है, न पति प्यार करता है और न ही सास| कहते हैं दो लालियाँ पैदा कर दी है| ये सब हमारे हाथ की बात तो नहीं ना दीदी| ये तो सब ऊपर वाले की कृपा है| न ठंग से खाने देते हैं और न ही पहनने को कपडे देते हैं, ऐसा लगता है मनो दीदी घर में सब चाहते हैं कि मेरी कली कैसे भी भगवान को प्यारी हो जाये| कभी-कभी तो हमें भी घर से बाहर निकालने की बात करते हैं| वैसे तो हम घर से निकले हुए ही हैं, हमारा आदमी दूसरी औरत लेके आ रहा है| इतना कह कर झवरी की आखों की किनखियों से पानी के दो मोती ज़मीन पे आ गिरे|

आपको पता है मैं क्यों अपनी बेटियों को घर नहीं छोडती? मैंने बोला नहीं, तुम ही बताओ| बोलती है घर के लोग पीछे से पानी अटका के मार देंगे मेरी नन्ही सी जान को| देखो न कितनी मासूमियत से हसती है| आँखों में मातृत्व का भाव लेकर कर अपनी बेटी को तीन मिनट कर निहारती रही और उसकी हरकतों को देख कर खुश होती रही|






तुम करती क्या हो झवरी और अगर तुम्हे घर से निकल दिया तो कैसे रहोगी, कभी सोचा है?
आँखों को थोडा छोटा करके दो मिनट सोचने के बाद बोली दीदी सोचा तो कभी नहीं पर इतना पता है अपनी बेटियों को यहाँ नहीं छोड़ेंगे, उनको पढ़ाएंगे-लिखाएंगे, अच्छा जीवन देंगे और शादी वो जब करना चाहेंगी तब कराएँगे| वैसे हम खेत का सारा काम कर लेते हैं तो कहीं मजदूरी करेंगे| सुना है शहर में बड़े लोग के घर काम वाली की ज़रूरत होती है हम वहां जाकर काम कर लेंगे|

तुम दूसरी शादी करने का नहीं सोचोगी? आँखें चड़ा कर बोली आदमी जात का क्या भरोसा दीदी, दूसरे ने भी छोड़ दिया तो एक और बेटी होने पर|





एक बात बोलें दीदी !! मैंने बोला! कहो तब से तुम ही तो हमें यहाँ बिठा कर रुला रही हो| थोडा हंसी और अपना एक हाथ मेरे पैर पर रख कर बोली आप एक औरत के दर्द को महसूस करती हो इसलिए रो रही हो, नहीं तो कौन किसे बैठ कर इतनी देर सुनता है, और आप को कितने दिन हुए हमेशा मिलने आती हो मेरी कली से| इसको आपकी आदत हो जाएगी|| मैंने बोला अब मुझे शर्मिंदा न करो बताओ क्या बोलने वाली थी| फिर थोडा हंसी और बोली ये दुनियां ऐसी है दीदी अगर लोगों के हाथ में लड़का-लड़की पैदा करना होता तो सिर्फ लड़के ही पैदा करते| कभी-कभी लगता है समाज में हम औरतों को इतनी कम इज्ज़त क्यों है| पर खैर कभी तो ये सब बदलेगा| इतना कह कर उठ खड़ी हुई और बोली बहुत बातें हुई दीदी अब काम पर लगते हैं| दूर खेत के बीच जाकर दुपट्टा बिछाया उसपर कली को बिठाया, फिर तल्लीनता के साथ काम में लग गयी| कभी- कभी बीच में नन्ही कली रोती तो उसे कुछ दिखा कर बहला देती और फिर काम में लग जाती|

Wednesday, May 17, 2017

बन्धनों को खोलता प्रेम

प्रेम की मिसाल आज से नहीं युगों-युगों से चली आ रही है| कृष्ण ने राधा, राम ने सीता, हीर ने राँझा, रोमियो ने जूलिएट, और न जाने कितने जिन्होंने प्रेम को परिभषित किया| जब भी इनकी कहानियों को हम सुनते हैं तो भाव-विभोर हो जाते हैं और  प्रेम की दाद देना शुरू करते हैं

हर ग्रन्थ, किताब या कहूँ व्यक्ति ने प्रेम को अलग-अलग तरीके से महसूस किया और इसे दुनिया की सबसे खुबसूरत भावना के रूप में बताया| कहते हैं सबरी ने राम को अपने झूठे फ़ल खिला दिए थे, और तो और मीरा ने कृष्णा के प्रेम में पड़ कर विष के प्याले को अमृत समझकर पी लिया था| ऐसे न जाने कितने उदाहरण है जिन्हें सिर्फ उन व्यक्ति विशेष ने जिया है औए अंत में जान देकर प्रेम को अमर किया है| अंत में त्याग ही हमेशा विजयी रहा है उसका कारण शायद यही है कि न तो आज और न ही युगों पहले लोगों ने इस खुबसूरत एहसास को स्वीकारा

रूमी ने प्रेम को जिस तरह परिभाषित किया, वह इंसान मात्र की कल्पना से परे रहा है| वस्तु से, मित्र से, कलम से, लिखने से, प्रेमिका से, आदि| अरे! ये कैसा प्रेम है जिसमे कोई शर्त नहीं, सिर्फ लगन ही लगन और वो भी ऐसी लगन जो सीधे प्रभु से मिलाने की बात करती हो| जिसमे प्रेम मिलने या एक होने की नहीं बल्कि सिर्फ समर्पण और प्रसन्नता भाव को प्राथमिकता देता हो

आज के दौर में देखा जाये तो समाज ही तय करता है कि प्रेम किससे करना है, क्यों करना है और कैसे करना है | ऐसे लगता है मनो जैसे लोग भूल गए हैं कि प्रेम जैसे खूबबसूरत एहसास को बन्धनों में बांध कर पवित्र नहीं रखा जा सकता| ये एक बहाव है जितना बहेगा उतना ही अपना प्रभाव छोड़ेगा|


प्रेम ही एक मात्र सत्य है जो सबको जीना सिखाता है- आनंदमय जीवन|

Friday, September 23, 2016

भ्रूण हत्या से भी बड़ी एक हत्या

कुछ दिन पहले एक इंटरव्यू पढ़ रही थी किसी आईपीएस/आईएएस का- उस इंटरव्यू में साफ़ शब्दों में, बड़े गर्व के साथ बताया गया था- इस सफलता का श्रेय मैं मेरे पापा को देती हूँ, उन्होंने मुझे कभी लड़की की तरह नहीं पाला, हमेशा लड़के की तरह रखा और पढाया| यक़ीनन गर्व की बात थी, इतनी बड़ी पोस्ट जो मिली थी वो भी मेहनत और घरवालों के सपोर्ट से, परन्तु एक सवाल यहाँ आकर खड़ा हो जाता है ?
ये मेरी तीसरे नंबर की बेटी है, है तो ये मेरी बेटी बट इसने मेरा नाम बेटे की तरह रौशन किया है | जब ये पैदा हुई थी तो घर में मातम छा गया था, परन्तु जिस तरह इसने परिवार के नाम को एक बेटे की तरह ऊचा किया है अब मुझे इस पर नाज़ होता है|
अजी बेटी नहीं बेटा है, हीरा है, सबसे ज्यादा इस बेटे ने मुझे आत्म संतुष्टि दी है सबसे जिम्मेदार और समझदार| 
बात सिर्फ यहाँ ही ख़तम नहीं हो जाती आप देखिये किसी भी रियलिटी शो ( कही भी) में जब बेटियां कुछ कर दिखाती है तो अक्सर माँ- बाप से सुंनने को मिलता है कि इसने मेरा इतना नाम रौशन किया है ये "मेरी बेटी नहीं ये मेरा बेटा है"| जब उम्मीदें  बहुत आगे होती हैं तो लोगों को और  भी यही चिल्लाते सुना है कि आगे जाकर ये मेरा नाम एक बेटे की तरह रौशन करेगी| ऐसे तमाम रियलटी शो, सेरिअल्स,इंटरव्यूज, कहानी, किस्से, कवितायेँ फिल्में और न जाने क्या- क्या जहाँ अक्सर लोग अपने बच्चियों की सफलता को यही कह कर प्रोत्साहित करते हैं | 
ऐसा लगता है मानो लोग पहले से ही मान के बैठे हैं कि बेटियों को बेटी समझ कर पढाया ही नहीं जा सकता| अगर बेटियों को घर से बाहर  भेजना है तो उसे बेटा मानना ही पड़ेगा| बेटियां -बेटी होकर कभी नाम रौशन कर ही नहीं सकती, और  अगर कर भी देती हैं तो न जाने क्यों उनको बेटों का दर्ज़ा दे दिया जाता है| मज़े की बात तो ये भी है कि हममें से ज्यादातर बेटियां ये सुनकर खुश हो जाती हैं कि हमें बेटों का दर्ज़ा दिया जा रहा है|

जब घर से बाहर पढने गयी तो घर में मैंने भी अक्सर सबको यही कहते सुना- वर्षा ( मेरा घर का नाम)तो बेटा है, बेटी होते हुए भी बेटों से आगे है| एकदिन खीज कर माँ को बोल दिया, ऐसा न कहा करो, पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लगता, करना है तो ऐसे ही  प्रोत्साहित कर दो|  उस वक़्त समझ नहीं आया था कि इतना बुरा क्यों लगता है,और शायद परिवार वालों को भी समझ नहीं आया होगा परन्तु कहना छोड़ दिया|
अरे मैं तो कहती हूँ भला हो उन लोगो का जो बेटी को पैदा होते ही मार देते हैं या पैदा होने से पहले ही मार देते हैं (कटाक्ष) क्योंकि इस हत्या से बड़ी हत्या और क्या हो सकती है कि बड़ा होने के बाद बेटी जब  नाम रौशन कर दे तो उसको बेटी ही न रहना दिया जाये|

बात यहाँ बेटा या बेटी की नहीं साहेब, और न ही मैं लड़कों के विपक्ष में हूँ| मुझे लगता है सबसे बड़ा अपमान/हत्या किसी की पहचान छिनना है|( फिर चाहे उस जगह कोई भी हो)
और यह पहचान आज से नहीं सदियों से छिनती आई है, जिसका एहसास भी नहीं होने दिया गया|

अब देखना तो ये है कि आने वाली फिल्म 'दंगल' में किस तरह से बेटियों को दिखाया गया है, बेटी ही रखा है या कुछ अलग करने पर उन्हें भी बेटों का दर्ज़ा देकर समान्नित (कहूँ या अपमानित ) किया जायेगा| 


....अब और नहीं...

Tuesday, July 7, 2015

एक पत्र प्रकृति के नाम

विकास पर विकास, विकास पर विकास, भईया कितना विकास? और किस-किस के लिए विकास?
सुनकर बड़ी ख़ुशी होती है कि भारत आधुनिकीकरण और विकास के मामले में बड़ी तेज़ गति से भाग रहा है, कभी डिजिटल इंडिया की बात सुनने को मिलती है तो कभी अलग-अलग राज्यों में दौड़ती मेट्रो की|
परन्तु महोदय हमारी चिंता का विषय बने हुए हैं बड़ी तेज़ गति से कटते पेड़- पौधे और बेघर होते पशु-पक्षी | इन्हें हमारे विकास में कोई रूचि नहीं | पशुओं को आज भी ज़मीन पर उसी तरह सोने की आदत है, जैसे वो आज से हज़ारों साल पहले सोते थे, और पक्षियों को आज भी पेड़ों पर घोंसले बनाने में उतने ही आनंद की अनुभूति होती है, जितने आज से हज़ारों साल पहले होती थी | परन्तु अब ना घर बनाने को पेड़ उतने बचे हैं और ना सोने को ज़मीन, सब पर मालिकाना हक़ है, तो वो सिर्फ इंसानों का | पक्षियों ने तो घरों में घर बना कर समझौता भी करने की कोशिश की, परन्तु हमारी जाति को चैन कहाँ - ये पक्षी बड़ी गंदगी करते हैं, बोल के, घोंसले बाहर निकाल फेंके |
और तो और मैंने तो एक महोदय को ये भी कहते सुना कि सरकार को प्लानिंग करना ही नहीं आता, किसी अच्छे सिविल अभियंता को बुलाते जो इस मेट्रो स्टेशन (जिन मेट्रो प्लेटफार्म की छतें खुली हैं) को सही से डिजाईन करता, देखो कितनी गंद मचा रखी है इन कबूतरों ने, टाप देते तो सफाई तो रहती | अब महोदय उनको इंग्लिश टॉयलेट प्रयोग करना कौन सिखाये? वैसे दौर आधुनिकीकरण का है, बदलना तो इनको भी चाहिए, पर क्या करें इनको हमारे आधुनिकिकरण और विकास से ना कुछ लेना-देना और ना ही कुछ फायदा | कुछ समय पहले मैंने एक स्टेटस देखा... महाशय ने फेसबुक पर बड़ी तक़लीफ और गुस्से के साथ लिखा था - ब्लडी अर्थक्वेक- कितनों के घर उजाड़ दिए, ऊपर वाला भी कितना नाइंसाफी करता है, लोगो की तकलीफ नहीं दिखती उसे (गुस्से वाले ३ चेहरे) |
अब ज़रा इन महोदय को कोई समझाए कि जिस तरफ उंगली उठा रहे हो उसमें तीन उंगली अपनी ही तरफ हैं, अरे पागल हाथी जब चलता है ना, तो वो ये नहीं देखता कि मैं कितनों को कुचलता हुआ जा रहा हूँ..क्योकि उसे अपनी धुन के आगे कुछ दिखाई नहीं देता, अब यही हाल हो गया है हमारी जाति का(मानव जाति), सब मतवाले हाथी हो चले हैं, बस अपनी धुन में अपने घर बसाये जा रहे हैं, कितनों के उजड़े हैं ये मालूम भी नहीं होगा | जनाब! घर... घर होता है, वो चाहे गरीब का हो, अमीर का या फिर पक्षियों का | साहब बड़ी तकलीफ होती है जब घर उजड़ते हैं | कितने मंजर देख चुकी है हमारी जाति घर उजड़ने के, फिर भी इसका मूल्य अभी तक समझ नहीं आया | कभी किसी उजड़े घर वाले की आँखों में आँखे डाल के देखा है? कितना दुःख और निराशा होती है |

अब इंसान का दर्द तो हम समझ ही सकते हैं क्योंकि कहने को तो हम भी इंसान ही है, पर भईया पक्षियों की आँखों में कैसे देखे ..?? अब कहीं बैठ के अच्छे से आँख दिखाए तो कुछ समझने की कोशिश भी की जाये | दुःख और दर्द तो तब ही समझ आता है न जब कोई चिल्ला-चिल्ला कर बताये या फिर रो-धोके सुनाये | पर कहते हैं, न ऊपर वाले के घर देर है, अंधेर नहीं | इंग्लिश में एक कहावत भी तो है- EVERYTHING IN NATURE IS ABOUT BALANCE. तो ये भी समझ लीजिये संतुलन का ही हिस्सा है |

और फिर एक बात हमारी भी सुनो- भूकंप से कोई नहीं मरता, अगर लोग मरते हैं तो अपनी खुद की बनायीं ठोस सीमेंट की बिल्डिंग्स के नीचे दब के| पृथ्वी के नीचे की हलचल कोई नई बात नहीं, इसका इतिहास उतना ही पुराना है जितना इसकी रचना का |
दो बातें हमें समझना बहुत ज़रूरी हो गया है, पहली ये कि पृथ्वी सिर्फ मानव जाति के लिए नहीं बनी है इसपर सबका बराबर हक़ है | और दूसरी ये कि हम सर्वोत्तम नहीं हैं, प्रकृति के एक छोटे से हिस्से हैं, एक सीमा तक बदलाव ठीक है, परन्तु खिलवाड़ ठीक नहीं |